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मेहनत ही सबसे बड़ी सिफारिश लेखनी प्रतियोगिता -25-Jan-2024

                शीर्षक:- मेहनत  ही सबसे बड़ी सिफारिश 
        

                मेहनतकश  इन्सान  के लिए उसकी मेहनत ही सबसे बड़ी  सिफारिश  होती है। इसके लिए  मुझे महाभारत  के एक पात्र एकलव्य  की कथा याद आती है। एकलव्य  कौन था? हमें बचपन  में पढा़या गया कि एकलव्य  गरीब व एक लाचार व्यक्त  था। यह गलत है मैने इस कथा में  एकलव्य  पर जो लिखा है वह महाभारत  से लिया गया है। हाँ यह सत्य  है कि एकलव्य  ने जो धनुर्विद्या सीखी थी वह अपने परिश्रम  से सीखी थी किसी सिफारिश  से नहीं।


         आचार्य द्रोणाचार्य अर्जुन को धनुर्विद्या में सर्वश्रेष्ठ बनाना चाहते थे। इस वजह से गुरु द्रोण ने एकलव्य को ज्ञान देने से मना कर दिया था। इसके बाद एकलव्य ने द्रोणाचार्य की मूर्ति बनाई और उस मूर्ति को गुरु मान कर धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा। लगातार परिश्रम  व अभ्यास करने से वह भी धनुर्विद्या सीख गया। और वह एक बड़ा  धनुर्धर  बन गया।

       एक बार  की बात  है कि  पांडव और कौरव राजकुमार  जंगल में भ्रमण कर रहे थे । राजकुमारों का कुत्ता एकलव्य के आश्रम में जा पहुंचा और भौंकने लगा। कुत्ते के भौंकने से एकलव्य को अभ्यास करने में परेशानी हो रही थी। तब उसने बाणों से कुत्ते का मुंह बंद कर दिया।
         एकलव्य ने उस  कुत्ते पर  इतनी कुशलता से बाण चलाए थे कि कुत्ते को बाणों से किसी प्रकार की चोट नहीं लगी।

जब वह कुत्ता लौटकर  राजकुमारौ के पास पहुंचा तब वह  धनुर्विद्या का ये कौशल देखकर दंग रह गए। तब वह गुरु द्रोणाचार्य के साथ बाण चलाने वाले की खोज करते हुए वे एकलव्य के पास पहुंच गए। गुरु द्रोण को लगा कि एकलव्य अर्जुन से श्रेष्ठ बन सकता है।
       जब गुरु द्रोणाचार्य  को देखकर एकलव्य  उनके चरणौ में गिर पड़ा।  
  गुरु द्रोणाचार्य  ने उसका परिचय  पूछकर  उसके गुरु का नाम  पूछा। एकलव्य  ने अपना परिचय  देकर कहा," भगवन आप ही मेरे गुरु है।" इतना बताकर  वह उनको अपनी कुटिया में अंदर लेकर  गया और अंदर रखी उनकी मूर्ति के दर्शन  करवाये।

     तब गुरु द्रोणाचार्य  ने बहुत  ही चतुराई  से उससे गुरु दक्षिणा में उसका अंगूठा मांग लिया था और एकलव्य ने अपना अंगूठा काटकर गुरु को दे भी दिया। अंगूठे बिना भी एकलव्य धनुर्विद्या में दक्ष हो गया था।

         एकलव्य  कौन था ? उसने गुरु द्रोणाचार्य  की मूर्ति  बनाकर एकलव्य  ने   क्यौ अभ्यास  किया था ?
        एकलव्य  हिरण्य धनु नामक निषाद का पुत्र था। उसके पिता श्रृंगवेर राज्य के राजा थे, उनकी मृत्यु के बाद एकलव्य राजा बना। उसने निषाद भीलों की सेना बनाई और अपने राज्य का विस्तार किया। एक प्रचलित कथा के अनुसार एकलव्य श्रीकृष्ण को शत्रु मानने वाले जरासंध के साथ मिल गया था। जरासंध की सेना की तरफ से उसने मथुरा पर आक्रमण भी किया।

     एकलव्य ने यादव सेना के अधिकतर योद्धाओं को मार दिया था।

श्रीकृष्ण जानते थे, अगर एकलव्य को नहीं मारा गया तो यह महाभारत युद्ध में वह कौरवों की ओर से लड़ेगा और पांडवों की परेशानियां बढ़ा सकता है। श्रीकृष्ण और एकलव्य के बीच युद्ध हुआ, जिसमें एकलव्य मारा गया।

       एकलव्य की मृत्यु के  बाद उसका पुत्र केतुमान राजा बना। महाभारत युद्ध में केतुमान कौरवों की सेना की ओर से पांडवों से लड़ा था। इसका वध भीम ने किया था।

      इस प्रकार  एकलव्य  की इस कथा  से हमें शिक्षा मिलती है कि हमारी मेहनत  ही हमारी सबसे बड़ी  सिफारिश  होती है। जब गुरु द्रोणाचार्य  ने एकलव्य  को धनुर्विद्या नही सिखाई  थी तब वह निराश नहीं हुआ  वह जंगल में ही कुटिया बनाकर उसमें गुरु द्रोणाचार्य  की मिट्टी की मूर्ति बनाकर उसके सामने नित्यप्रति अभ्यास  करने लगा। और वह एक सफल धनुर्धर  बन गया।
   इसलिए  मेहनत  ही सबसे बड़ी  सिफारिश  होती है।

आज  की दैनिक  प्रतियोगिता हेतु।
नरेश शर्मा " पचौरी"

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11 Comments

Mohammed urooj khan

30-Jan-2024 11:48 AM

👌🏾👌🏾👌🏾👌🏾👌🏾

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Gunjan Kamal

25-Jan-2024 10:01 PM

👏👌

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Khushbu

25-Jan-2024 09:46 PM

Nice

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